Monday, March 14, 2011

माँ के मन की बात

रमिया माँ है
वह अटरिया में
अकेले बैठे-बैठे
बुन रही है
अपना भविष्य
यादों के अनमोल
और उलझे धागों से,
उसके सामने
बिखरे हैं
सवाल ही सवाल
वो सालों से खोज रही है
उन अनसुलझे
प्रश्नों के उत्तर
लेकिन आज तक भी
नहीं मिल पाया है उसे
कोई भी उत्तर ।
आज भी वे प्रश्न
प्रश्न ही बने हुए हैं
वह जी रही है आज भी
और जीती रहेगी
युगों-युगों तक
अपने सवालों के
उत्तर पाने के लिए।
वह एक माँ है
जिसने झेले हैं
अनेक झंझावात।
वह अपने ही मन से
पूछ रही है पहेली -
क्यों नहीं है उसको
बोलने का अधिकार
या फिर अपनी बात को
कहने का अधिकार,
क्यों नहीं है उसे
अपनी पीड़ा को
बाँटने का अधिकार,
क्यों नहीं है?
ग़लत को ग़लत
कहने का अधिकार ।
क्यों उसके चारों ओर
लगा दी जाती है
कैक्टस की बाड़
क्यों कर दिया जाता है
उसे हमेशा खामोश
क्यों नहीं
बोलने दिया जाता उसे ?
यह प्रश्न अनवरत
उठता रहता है
उसके भोले मन में,
बिजली-सी कौंधती रहती है
उसके मस्तिष्क में,
बचपन से अब तक
कभी भी अपनी बात को
निर्द्वंद्व होकर कहने की हिम्मत
नहीं जुटा पाई है वह ।
जब भी कुछ कहने का
करती है प्रयास
मुँह खोलने का
करती है साहस
वहीं लगा दिया जाता है
चुप रहने का विराम ।
आठ की अवस्था हो
या फिर साठ की
वही स्थिति,वही मानसिकता
आखिर किससे कहे
अपनी करुण-कथा
और किसको सुनाए
अपनी गहन व्यथा ।
जन्म लेते ही
समाज द्वारा तिरस्कार
पिता से दुत्कार
फिर भाइयों के गुस्से की मार
ससुराल में पति के अत्याचार
सास-ननद के कटाक्षों के वार
वृद्धावस्था में
बेटे की फटकार
बहू का विषैला व्यवहार
सब कुछ सहते-सहते
टूट जाती है वह,
क्योंकि उसे तो मिले हैं
विरासत में
सब कुछ सहने और
कुछ न कहने के संस्कार ।
यदि ऐसा ही रहा
समाज का बर्ताव
मिलते रहे
उसे घाव पर घाव,
ऐसी ही रही चुप्पी
चारों ओर
तो शायद मन की घुटन
तोड़ देगी अंतर्मन को
अंदर-ही-अंदर,
फैलता रहेगा विष
घुटती रहेंगी साँसें,
टूटती रहेंगी आसें
तो जिस बात को
वह करना चाहती है अभिव्यक्त
वह उसके साथ ही चली जाएगी,
फिर इसी तरह
घुटती रहेंगी बेटियाँ,
ऐसे ही टूटता रहेगा
उनका तन और मन,
होते रहेंगे अत्याचार;
होती रहेंगी वे
समाज की घिनौनी
मानसिकता का शिकार |
कब बदलेगा समय
कब बदलेगी मानसिकता
कब समाज के कथित ठेकेदार
समाज की चरमराई व्यवस्था को
मजबूती देने के लिए
आगे आएँगे
क़दम बढ़ाएँगे,
जब माँ के मन की बात
उसकी पीड़ा,उसकी चुभन,
उसके मन का संत्रास
समझेगी आज की पीढ़ी,
विश्वास है उसे
कि वह दिन आएगा
जरूर आएगा ।

हां, सच से डर लगता है

रेखा...भगवती चरण वर्मा का वो उपन्यास जिसे पढ़ने का मौका मुझे कई बार मिला लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से टल गया... रेखा समाज की परतों को खोलती एक अदभुत रचना है...जो हरयुग में अपनी शसक्त मौजूदगी दर्ज कराती रहेगी...

लेकिन दिक्कत ये कि जब मैने इस उपन्यास को पढ़ना शुरू किया, ठीक इसी समय स्टार प्लस पर एक प्रोग्राम शुरू हुआ सच का सामना...दोनो की विषयवस्तु एक, समाज का शारीरिक सच...
रेखा और सच का सामना में हिस्सा ले रही प्रतियोगियों की सच्चाई में फर्क सिर्फ इतना कि रेखा में भगवती चरण वर्मा जी ने जब-जब रेखा को शरीर के लिए कमजोर होते हुए दिखाया है...उसके तुरंत बाद रेखा के तर्क रखे हैं...रेखा क्यों बार-बार किसी पुरुष से संबंध बना लेती है, इसका कारण भी बताया जाता है...हालांकि हर दूसरे पल रेखा को लगता है कि  वो गलत कर रही है लेकिन हर अगले पल वो वही करती है...हालांकि, सच का सामना के प्रतियोगी जब-जब सच को बयां करते हैं तब-तब वो बड़े भावुक हो जाते हैं...उन्हें पश्चाताप होता है या नहीं ये पता नहीं...लेकिन चेहरे पर ऐसी लकीरें जरूर खिंच जाती है कि जैसे अगर पैसे का मोह न हो तो वो कभी इस सच को बयां करे ही नहीं...अमूमन समाज में ऐसे सच को बयां करता भी कौन है???
वैसे जीवन की कईएक ऐसी सच्चाई होती है जिसे हम कभी बयां नहीं करना चाहतें...और करते भी नहीं हैं...

पश्चिम की नकल बताई जा रही इस धारावाहिक को बंद करने की  मांग उठ रही है...संभव है कि इस प्रोग्राम का पर्दा गिर जाए...अगर ऐसा हुआ तो ये ठीक वैसे ही होगा जैसे कूड़े को बुहार कर दरी के नीचे छिपा देना...
ये बता पाना बड़ा कठिन है कि अगर हम पर्दे पर इस तरह के सच को देखने सुनने लगें तो हमारा क्या होगा? हमारे समाज का क्या होगा? हम पर कितना गलत असर पड़ेगा?
एक बड़ा सवाल यहां ये भी उठता है कि क्या हम पर और हमारे समाज पर सबसे ज्यादा असर टीवी का ही पड़ता है? सच का सामनामें जो सवाल पूछे जा रहे हैं और जो उसके जवाब दिए जा रहे हैं, उसका हमपर असर पड़ सकता है ये तर्क उनलोगों की तरफ से दिए जा रहे हैं जो लोग इस प्रोग्राम को बंद कराना चाहते हैं। शायद उन्हें लगता है कि प्रोग्राम बंद होने के बाद समाज की तमाम ऐसी विकृतियां खत्म हो जाएगी...ऐसा करना किसी बुरी चीज को देखकर अपनी आंखे बंद कर लेने जैसा है... हर समाज की अपनी सच्चाई होती है...उसके अपने संस्कार होते हैं...  
पांच प्रतियोगयों में अभी तक किसी ने ऐसा जवाब नहीं दिया है कि वो पति या पत्नीव्रता हैं...वो पर स्त्री और पर पुरुष के बारे में सोचते नहीं...ये उनकी अपनी सच्चाई है...ऐसा नहीं है कि एक ने दूसरे से सुन कर, सीख कर कुछ कहा है। सबके अपने अपने अनुभव हैं। ये हमारे बीच के लोग हैं और यकीनन थोड़े हिम्मती भी...वरना, कहां लोग अपनी ज़िंदगी के निजी पन्नों को खोल पाते हैं...ये साहस सबके पास नहीं होता...इसके लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए...और उन्हें अपने से अलग या भिन्न समझने की बिला वजह कवायद नहीं करनी चाहिए... 
इतनी हिम्मत तो रेखा में भी नहीं दिखती...वो भी जब पर पुरुष के साथ संबंध बना कर लौटती है तो अपने पति को नहीं बताती...हालांकि इस कोफ्त में वो रात भर जगती है...अपने आंसुओं से अपने बुजुर्ग पति के पैर धोती है...लेकिन कभी बता नहीं पाती...अपने आप में सिर्फ इतना कहती है..शरीर का अपना धर्म होता है....वो मन से हमेशा अपने पति की होती है लेकिन शरीर के लिए न जाने कहां कहां चली जाती है...यूं कहें कि कहां नहीं चली जाती है...पाठक अपने तरीके से रेखा को बयां करते हैं...रेखा आत्मिक रूप से जितनी पवित्र है शरीर को लेकर उसकी मानसिकता उतनी ही घटिया...लेकिन आदमी तो शरीर और मन का मेल है...वो पूरा ही तभी होता है...ये आप पर निर्भर करता है कि आप किसे तवज्जो देते हैं? शरीर को आत्मा को दिमाग को? या फिर रेखा की तरह समय के साथ साथ अलग अलग चीजों को...
रेखा  जमाने पहले लिखी गई है...सच का सामना आज का सच है...लेकिन दोनो में रत्ती भर का फर्क नहीं है...क्यों???  शायद समाज से बड़ा होता है व्यक्ति...व्यक्ति जो प्रकृति का हिस्सा है...और रेखा के शब्दों में शरीर का अपना धर्म होता है....समाज का अपना...और सच दोनो है...जो अलग अलग समय पर तवज्जो पाता है...
सच का सामना....में जो प्रतियोगी आते हैं अगर उन्हें अपना सच बयां करने में आपत्ति नहीं है तो हमें क्या परेशानी हो सकती है, ये समझ से परे है...रही बात ये कि इसका समाज पर बड़ा बुरा असर पड़ेगा..बच्चे बिगड़ जाएंगे, हम बिगड़ जाएंगे.. तो ऐसा भी नहीं होता है...देश में पिछले दशक में ना जाने कितने धार्मिक चैनल खुले हैं लेकिन उस तेज़ी में क्यो लोग धार्मिक हुए हैं???

बोलो..तपस्वी बनोगे

वो किसी का शत्रु नहीं है...सबका दोस्त है...धीमे धीमे बोलता है... उसने अपने जीवन के कोणों को मिटा दिया है...वो अब गोल है...
सपाट चिकना गोल...उसपर बाहरी वातावरण का असर नहीं होता...
क्या बात है...अगर किसी को दुनिया ज्यादा बुरी लगने लगी हो...तो उनके लिए सलाह है कि वो भी अपने जीवन के कोण मिटा दें...
सब ठीक हो जाएगा...
ऐसे ही लोगों को आज का तपस्वी कहते हैं...देखिएगा...ये साधना आसान नहीं होती....साधने के पहले विचार जरूर कर लीजिएगा...
उस तपस्वी को मेरा नमस्कार

लड़की...खूबसूरत लड़की...और दोस्त...वाह वाह वाह

सुनते हैं आजकल इ धंधा खूब जोरों पर है कि कौन किसका और किसकी दोस्त है? ये दुनिया को बताया जाए, ये कहते हुए कि किसी को मत बताना...वैसे, ऐसी ही बातें दुनिया को सबसे ज्यादा पता होती है...जिसे बताते हुए ये कहा जाता है कि सुनो किसी को मत बताना अंदर की बात है...सिर्फ हमको पता है...और अब तुमको बता रहे हैं...श्री श्री 1008 जी ने पहले श्री श्री 1008....जी को उकसाया...दुनिया को बताया कि ,देखो जी की खूबसूरत दोस्त को देखो...और जी कितना जान छिड़कते हैं ये भी देखो...अब जी दिखा रहे हैं जी को...देखो देखो....देखो कि उनके लिए करोड़ों रुपये कोई मायने नहीं रखता...इसी बीच एक और रसिक कूदते हैं....मजा लेते हुए...भाई आगे-आगे चलो हम भी पीछे हैं तुम्हारे....कहते हुए साब पूरे सीन में एंट्री करते हैं......अरे खुशकिस्मत है वो तो...खूबसूरत लड़की से दोस्ती है...क्या गलत है इसमें???
जैसे कि उनका तो जिह्वा लपड़ रहा हो ये कहने कि लिए कि भाई हमें देखो हमे भी दिखाओ....चलो मेला घुमाओ...और सीन से गायब हो जाते हैं...हम भी पीछे हैं तुम्हारे...कोई गलती नहीं है साहब जी कोई गलती नहीं है किसी की गलती नहीं है...प्रेम तो अंधा होता है...और अंधा कोई गलती करे भी तो उसे माफ करो यार...
लेकिन दिक्कत फिर कैसे होती है....आखिर राही मनवा को तकलीफ क्यों होने लगती है...फूल सी कोमलांगा दोस्त दुश्मन कैसे लगने लगती है? ये बात समझ में नहीं आती...अरे बेवकूफ...बगिया में एक ही फूल तो होता नहीं है...और हर फूल अगले फूल से सुंदर होता है....फिर एक ही फूल क्यों देखें भला....बगिया है किसके लिए फिर???.....लेकिन....
फूल कभी जब बन जाए अंगारे...

नंगे पांव मेरा दोस्त










पीले रंग की बुशर्ट
और पीले रंग की पैंट
'गरीब'
भूखा, नंगा गरीब
ये आम राय थी लोगों की 
लेकिन मेरा दोस्त नंगा नहीं था
ताकिद!
सिर्फ उसके पांव नंगे थे...
वो नंगा नहीं था,
परिस्थितियां थीं जो नंगी थीं,
और नंगा था उसका समाज
जो उसके ईर्द-गिर्द खड़ा था...
जूते वालों का समाज
और इन सबके बीच...
नाचती,ठिठोली करती नंगी थी उसकी किस्मत
कह रहे थे लोग
कैसी किस्मत लेकर आया है...
दिल्ली की चिलचिलाती धूप में इसके पास जूते भी नहीं हैं...
देखो!
शायद देखने वालों ने ये नहीं देखा था
कैसे उसके बापू ने थामी थी उसकी उंगली
और उस भीड़ में कैसे कातर थी उसकी मां की नज़रें
जो लगातार उसके नंगे पांवो को निहार रही थी
कहीं किसी जूते से दब न जाए, इस खयाल में...
कैसे था बदकिस्मत मेरा दोस्त
कैसे था वो भूखा,नंगा गरीब
कैसै...
सिर्फ इसलिए कि उसने नहीं पहने थे जूते?

चलो दोस्त...

एक सपना जल्दी से बुन लो
सुन लो अपने दिल की बात
ये तुम्हारा वक्त है
आगे बढ़ो, लपक लो
तुम ही होगे कल
हर जगह, हर शिखर पर
उठो, भागो...
कोई है जो तुम्हारा इंतजार कर रहा है
उसके लिए उठो
तुम उठोगे, तो वो दौड़ पड़ेंगे
उनके दौड़ने के लिए उठो
एक सपना खरीदो
सच करो उसको 
किसी के लिए तो उठो यार
उठ जाओ...
खटखटाओ ना कोई दरवाजा
खुलेगा..
देखना, जरूर खुलेगा
हर बंद दरवाजे पर ताला नहीं लगा होता
उठो, चलो खोल दो...
उस दरवाजे को खोल दो
जिसके पार जाने का अधिकार सिर्फ तुमको है..
चलो दोस्त 
चलते हैं...
आ जाओ....

Sunday, March 13, 2011

Striving with no guarantee of success

 I'm reminded that there is an obligation on Christians to make an effort to do the difficult thing: follow Jesus, with all the sacrifice and service that this entails. In the passage he insists that we strive.

‘Strive to enter through the narrow door; for many, I tell you, will try to enter and will not be able. When once the owner of the house has got up and shut the door, and you begin to stand outside and to knock at the door, saying, “Lord, open to us”, then in reply he will say to you, “I do not know where you come from.” Then you will begin to say, “We ate and drank with you, and you taught in our streets.” But he will say, “I do not know where you come from; go away from me, all you evildoers!” There will be weeping and gnashing of teeth when you see Abraham and Isaac and Jacob and all the prophets in the kingdom of God, and you yourselves thrown out. Then people will come from east and west, from north and south, and will eat in the kingdom of God.

It's not enough to sit back and enjoy the kingdom of God, as though "once saved always saved" were true. The kingdom demands a consistent and repeated effort of Christians.

And I don't see any indication of "success" at all. It's not even a matter of misunderstood success; we can't just say that we succeed by having a happy family rather than the false success of big house and a nice car. No, it looks as though it's the sincere intention of effort that is important in Jesus' message. Sincere intention of effort, and not just sincere intent; that's a necessary part of Christian being.